IPL Me Istemal Hone Wale Technology

देश मैं बच्चे, किशोरों, युवाओं सहित हर व्यक्ति की क्रिकेट के प्रति दिवानगी किसी से छिपी नहीं है । एडवांस तकनीक ने टेक्नोलॉजी टेलीविजन पर मैच देखने का आनंद दुगना कर दिया है आज से शुरू हो रहे IPL यानी "इंडियन प्रीमियर लीग" के 11वें सीजन के मौके पर जानते हैं कि तकनीक ने आपके पसंदीदा खेल को कितना रोमांचक बना दिया है...

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि 19वीं सदी तक क्रिकेट में अंडरहैड बाॅल का इस्तेमाल होता था, लेकिन 1862 में ओवर आर्म गेंदबाजी को लेकर एक British खिलाड़ी ने मैदान छोड़ दिया और इसे नो बॉल देने के लिए प्रोटेस्ट करने लगा। इसके बाद गेंदबाजों के लिए ओवरहेड गेंदबाजी का नया नियम बनाया गया हालांकि इस नियम में नाटकीय रूप से क्रिकेट के खेलों को बदल दिया। अब बल्लेबाजों के लिए गेम की मूवमेंट को जज करना मुश्किल हो गया है। उसके बाद से कई तरह के बदलाव आए और तकनीक का इस्तेमाल बढता गया। आइए, जानते हैं आज हम आज के समय में इस जेंटलमैन में इस्तेमाल की जाने वाली कुछ खास तकनीकों के बारे में.....

IPL Me Istemaal Hone Wale Technology

स्निकोमीटर


नहीं एज को सुनना फील्ड अंपायर के लिए भी कई बार मुश्किल भरा होता है इसलिए आजकल थर्ड अंपायर स्निकोमीटर का इस्तेमाल करने लगे हैं। इस टेक्नोलॉजी के जरिए यह जानना आसान हो जाता है कि बॉल का बैट के किसी हिस्से से संपर्क हुआ था या नहीं। इस तकनीक में अलग-अलग साउंड वेब के जरिए यह पता लगाया जाता है, कि बॉल बैट से लगी थी, या पेड़ से या फिर कहीं और। स्निकोमीटर में बेहद संवेदनशील माइक्रोफोन का इस्तेमाल किया गया है, जो पिच के दोनों और के स्टंप में लगा होता है। जो साउंड वेब्स को मापता है। आॅसिलकिलस्कोप कैमरे की मदद से माइक्रोफोन द्वारा कैप्चर साउंड को दिखाता है।

हॉट स्पॉट


जब लगा कि स्निकोमीटर बहुत ज्यादा सटीक नहीं है, तब क्रिकेट में हॉटस्पॉट का इस्तेमाल शुरू हुआ। यह  इंफारेड इमेजिंग सिस्टम है। इसमें यह पता लगाना आसान हो जाता है कि वह खिलाड़ी के पास पहुंचने से पहले कहां लगी थी। स्निकोमीटर जिस तरह साउंड वेब पर निर्भर है उसी तरह हॉटस्पॉट हिट सिग्नेचर पर डिपेंड करता है। इस टेक्नोलॉजी के लिए 2 कैमरों का इस्तेमाल होता है जिसे ग्राउंड के दोनों किनारों पर लगाया जाता है यह वॉलट वर्ल्ड के बेस्ट हेयर कलर या फिर किसी अन्य जगह पर लगने के बाद उत्पन्नन हिट को मेजर करता है इसे सॉफ्टवेयर नेगेटिव इमेज जनरेट करता है।

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हॉक आइ


हॉक आइ का इस्तेमाल क्रिकेट के अलावा टेनिस, फुटबॉल जैसे अन्य गेम में भी किया जाता है। हॉक आई 5 मिली मीटर आई 5 मिली मीटर की सीमा के भीतर भी सही आकलन करता है। यह तकनीक बॉल को उसी प्रकार मापती है, जैसे वह फेंकी जाती है। इस तकनीक में 6 कैमरे के माध्यम से आंकड़े प्राप्त किए जाते हैं जो फील्ड में अलग-अलग जगह लगाए जाते हैं। कैमरे बॉल को अलग अलग एंगल से ट्रैक करते हैं सभी 6 कैमरे के वीडियो को मिलाकर यह 3D इमेज क्रिएट करते हैं, जिससे गेंद के सही इपैक्ट और स्पीड का पता चलता है। यह तकनीक एलबीडब्ल्यू 'लेग बिफोर विकेट' के दौरान निर्णय लेने में तीसरे अंपायर की मदद करता है। इससे यह पता चल जाता है कि वाॅल कहां पर पिचं हुई थी, उसका इंपैक्ट क्या था। क्या गेम जब बल्लेबाज के पेड़ से टकराई थी? क्या वह वास्तव में स्टंप की लाइन में थी। इसके माध्यम से गेंद की दिशा और स्वयं को एक साथ मापा जाता है UDRS अंपायर डिसिशन रिव्यू सिस्टम के तहत आजकल अंपायर निर्णय देने के लिए स्कोर हॉटस्पॉट और हॉ आई तकनीक का इस्तेमाल करते हैं।

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